एम. एस. पी. क्या है और किसानों को इसके खत्म होने का डर क्यों सता रहा है-

दोस्तों पिछले कुछ दिनों से आपको दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में किसानों के द्वारा हो रहे आंदोलन के बारे में सुनने को मिल रहा होगा| किसानों का आंदोलन करने का केवल एक ही लक्ष्य है कि तीन कृषि कानून को ना बनने दिया जाए और एम. एस. पी. कानून को खत्म ना होने दिया जाए| सरकार किसान की फसल के लिए एक न्यूनतम मूल्य निर्धारित करती है, जिसे एम. एस. पी. कहा जाता है| दोस्तों आखिर किसानों की एम. एस. पी. के खत्म होने का इतना डर क्यों हैं? आइए हमारे आर्टिकल के जरिए इसके बारे में पढ़ते हैं-

एम. एस. पी. क्या हैं-

एम. एस. पी. सरकार की तरफ से किसानों की अनाज वाली कुछ फसलों के दाम की गारंटी होती है| सरकार अभी कुल 23 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करती है| एम. एस. पी. की गणना हर साल सीजन की फसल आने से पहले तय की जाती है|

बाजार में उस रेट भले ही कितने ही कम क्यों न हो, सरकार उसे तय एम. एस. पी. पर ही खरीदेगी| हालांकि सरकार एम. एस. पी. पर खरीद के लिए बाध्य नहीं है|

एम. एस. पी. पर फसल खरीदने का कोई कानून नहीं है| भले ही सरकार किसानों से उनकी फसल एम. एस. पी. पर खरीदती हो, लेकिन सरकार इसके लिए बाध्य नहीं है| क्योंकि ऐसा कोई कानून नहीं|

गेहूं के लिए पहली बार एम. एस. पी. का ऐलान हुआ था-
समिति की सिफारिशें लागू होने के बाद 1966-67 में पहली बार गेहूं के लिए एम. एस. पी. का ऐलान किया गया|

कैसे हुई एम. एस. पी. की शुरुआत-
1947 में अंग्रेजों से मिली आजादी के बाद किसान इस बात से बहुत परेशान थे कि अगर किसी फसल का बंपर उत्पादन हो जाए तो उन्हें उस फसल के अच्छे दाम नहीं मिल पाते थे|

इस तरह से किसानों की लागत भी नहीं निकल पाती थी, जिस कारण वो आंदोलन करने लगे|

इसके बाद लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री रहते हुए 1 अगस्त, 1964 को एलके झा के नेतृत्व में एक समिति बनी, जिसका काम अनाजों की कीमतें तय करने का था|

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