इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं होता हैं| Manjit Singh Motivational Story in Hindi.

इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं होता हैं Manjit Singh Motivational Story in Hindi



प्यार से बड़ा कोई धर्म नहीं होता हैं, परोपकार से बड़ा कोई कर्म नहीं होता हैं!

इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं होता हैं Manjit Singh Motivational Story in Hindi
Manjit Singh. मंजीत सिंह|

मंजीत सिंह (Manjit Singh), दोस्तों इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं होता, इस बात का प्रमाण एक सिख युवक है, जिसने दुर्घटना के कारण घायल हुई महिला के खून को रोकने के लिए अपने पगड़ी का प्रयोग किया| यह घटना जम्मू कश्मीर के अवंतीपुरा का हैं, जहाँ पर किसी ट्रक ने एक मुस्लिम महिला को टक्कर मार दी थी| उस मुस्लिम महिला को बहुत ही गंभीर चोट आयी|



इसके कारण वह महिला मदद के लिए चिल्ला रही थी और उस महिला का खून भी बह रहा था| जब यह सारी घटना घटी, उस समय वहाँ  पर 18 वर्षीय मंजीत सिंह भी मौजूद थे| वह यह सब देखते ही भागते हुए उस घायल महिला के पास आया और उसके निकलते हुए खून को रोकने के लिए मंजीत सिंह ने अपनी पगड़ी को उतारा और घायल महिला के जख्मों पर बाँध दिया|

उस दुर्घटना के कारण महिला का पैर बहुत ज्यादा घायल हो गया था और उस महिला के पैर का खून भी नहीं रूक रहा था| वहाँ पर मौजूद सभी लोग केवल तमाशबीन बनकर या तो उसे देख रहे थे या उसे देखकर जा रहा और या तो उसका Video बना रहे थे परन्तु कोई भी उस  महिआ की मदद करने के लिए आगे नहीं आ रहा था|

इतने में वह मौजूद मंजीत से रहा ना गया और उन्होंने उस घायल महिला की मदद की| मंजीत सिंह ने कश्मीर लाइफ से बात करते हुए कहा-मैंने देखा की महिला सड़क पर गिरी हुए हैं और उसके पैर से बहुत तेज खून निकल रहा हैं|



आगे मंजीत सिंह ने कहा कि उस महिला को देखकर  मुझसे उसकी पीड़ा नहीं देखी गयी और मैने तुरंत अपनी पगड़ी को उतारकर  महिला के खून को रोकने की कोशिश की| उन्होंने कहा की एक सिख के लिए उसकी पगड़ी धार्मिक आस्था से जुड़ी होती हैं,बल्कि यह गर्व का भी प्रतीक हैं,लेकिन उस पगड़ी को उतारकर किसी की जान को बचाना ही सबसे बड़ी मानवीयता हैं|

मंजीत कश्मीर लाइफ से बात करते हुए सबको बताते हैं कि वह मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं और उनका मानना हैं की दूसरे की मदद करना ही सबसे बड़ा धर्म हैं|

मंजीत सिंह के  पिता करनैल सिंह शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी में अस्थाई रूप से काम किया करते थे| उनके  देहांत के बाद मंजीत को उन के पद की नौकरी मिली| मंजीत की माता जी शारीरिक रूप से सक्षम नहीं हैं| मंजीत की एक बहन और एक भाई हैं जिनका पूरा भार मंजीत पर हैं| मंजीत कहते है की मेरे पिता ने 25 वर्षो सर्विस की लेकिन उन्हें स्थाई नहीं किया गया,उन्होंने मुझे भी स्थाई करने का आश्वासन दिया लेकिन अभी भी पूरा नहीं हुआ हैं|

” कोई बोलता हैं,तुम हिन्दू बन जाओ|

कोई  बोलता हैं,तुम मुसलमान बन जाओ|

कुछ  ऐसा कर जाओ इस जिंदगी में कि,

हर मजहब की  तुम “पहचान” बन जाओ| “



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Sanjana

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