नवरात्रि का त्यौहार| Indian Festival Navratri Celebration in Hindi.

 


||नवरात्रि का पर्व ||श्री दुर्गा नवरात्रि की कथा||



नवरात्रि का पर्व

दोस्तों नवरात्रि का त्यौहार भारतीय संस्कृति का बहुत ही प्रिय त्यौहार है | माता रानी के इस पर्व को लोग बड़ी ही धूम-धाम से मनाते हैं , व्रत करते हैं ,विधि विधान से पूजा करते हैं , यही नहीं यह एक ऐसा त्यौहार है जो एक साल में दो बार  आता है , अब बात करते हैं नवरात्रि कथा की जो आपके दिल को छू जाएगी|


श्री दुर्गा नवरात्रि की कथा

पीटत मनोहर नगर में एक अनाथ नाम का ब्राहमण रहता था | वः भगवती दुर्गा का भक्त था | उसके सम्पूर्ण सद्गुणों से युक्त मानो ब्रह्मा की सबसे पहली रचना हो ऐसी यथार्थ नाम वाली सुमति नाम की एक बहुत  ही सुंदर पुत्री पैदा हुई | वह कन्या सुमति अपने पिता के घर बालकपन में अपनी सहेलियों के साथ खेलती हुई, इस प्रकार बड़ी होनी लगी की जैसे शुल्कपक्ष की कला बढ़ती हैं|

उसके पिता प्रतिदिन जब दुर्गा की पूजा और होम किया करते थे तब वह भी नियम से वहां उपस्थित  रहती थी| एक दिन वह सुमति अपने सहेलियों के साथ खेलने लग गयी ,और भगवती पूजन में उपस्थित नहीं हुई | उसके पिता को पुत्री की ऐसी असावधानी देखकर बहुत क्रोध आया और पुत्री से कहने से लगा की हे दुष्ट पुत्री! आज प्रभात से तूने भगवती का पूजन नहीं किया ,इस कारण  में तेरा विवाह किसी कुष्ठी मनुष्य के साथ करूँगा |


इस प्रकार कुपित पिता का वचन सुनकर सुमति को बहुत दुःख हुआ और वह पिता से कहने लगी – हे पिता जी! मैं आपकी कन्या हूँ | मैं सब तरह से आपके आधीन हूँ | जैसी आपकी इच्छा हो मेरा विवाह कर सकते हैं पर होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा हैं मेरा तो इस पर पूर्ण विश्वास हैं | मनुष्य न जाने कितने मनोरथो का चिंतन करता हैं पर होता वही हैं जो उसके भाग्य में विधाता ने  लिखा हैं | जो जैसा कार्य करता हैं उसको फल भी उसी कर्म के अनुसार मिलता हैं |

क्यूंकि कर्म मनुष्य के आधीन है पर फल देवता के आधीन है | पुत्री के ऐसे वचन सुनकर ब्राह्मण को अत्यधिक क्रोध आया हैं तब उसके अपनी पुत्री का विवाह एक कुष्ठी के साथ कर दिया और अत्यन्त क्रुद्ध होकर अपनी पुत्री से कहने लगे जाओ – जाओ , जल्दी जाओ और अपने कर्मो का फल भोगो | देखते हैं कि वह भला भाग्य के भरोसे क्या करती हैं ? अपने पिता द्वारा ऐसे कटु वचनो को सुनकर सुमति अपने मन में विचार करने लगी कि  अहो मेरा बड़ा दुर्भाग्य जिससे मुझे ऐसा पति मिला है |


इस तरह अपने दुःख का विचार करती हुई वह सुमति अपने पति के साथ वन में चली गयी और उस स्थान पर उन्होंने वह रात बड़े कष्ट से व्यतीत की | उस गरीब बालिका के इसी दशा देखकर भगवती पूर्व पुण्य के प्रभाव से प्रकट होकर सुमति से कहने लगी कि हे दीन में तुमसे प्रसन्न हूँ , तुम जो चाहो वो वर्धन मांग सकती हो मैं प्रसन्न होने पर मनवांछित फल देती हूँ|

इस प्रकार बागवती दुर्गा के ऐसे वचन सुनकर सुमति कहने लगी कि आप कौन हो जो मुझ पर प्रसन्न हुई हो | यह सब मुझसे कहो और अपनी कृपा दृष्टि से मुझ दीन  दासी को कृताथ करो | सुमति के ऐसे वचन सुनकर देवी कहने लगी में आदिशक्ति हूँ और ब्रह्मविद्या और सरस्वती हूँ | और में तुझ पर तेरे पूर्व जन्म के के पुण्य से प्रसन्न हूँ |


तुम्हारे पूर्व जन्म का वृतान्त  सुनाती हूँ ,सुनो ! तू पूर्व जन्म में निषाद की पत्नी थी और पतिव्रता थी | एक दिन तेरे पति निषाद ने चोरी की  चोरी करने के कारण तुम दोनों को सिपाहियों ने पकड़ लिया और जेलखाने में कैद कर दिया |  उन लोगों ने तुझे और तेरे पति को भोजन नहीं दिया | इस प्रकार नवरात्र के दिनों में तुमने न तो कुछ खाया और न ही जल पिया | इसलिए नौ दिन तक नवरात्र का व्रत हो गया | हे ब्राह्मणी ! उन दिनों में जो व्रत हुआ उस व्रत के प्रभाव से प्रसन्न होकर में मनवांछित फल दे रही हूँ |

तुम्हारी जो इच्छा  हो सो मांगो , इस प्रकार दुर्गा के दिए वचन सुनकर ब्राह्मणी बोली की मैं आपको प्रणाम करती हूँ | कृपा कर मेरे पति के कोढ़ को दूर करो | मेरे प्रभाव से तेरा पति कोढ़ से रहित और सोने के समान शरीर वाला हो जायेगा | तब उसके पति का शरीर भगवती दुर्गा की कृपा से कुष्ठहीन होकर अति कान्तियुक्त हो गया | जिसकी कांति  के सामने चन्द्रमा भी कम हैं |


सुमति अपने पति को सोने के सामने देखकर दुर्गा भगवती के जय जय कार करने लगी | और कहने लगी की आप दुर्गति को दूर करने वाली हैं , तीनो जगत का संताप हरने वाली हैं , समस्त दुखो को दूर करने वाली हैं , और दुष्ट मनुष्य का नाश करने वाली हो | तुम ही जग की माता हो तुम ही पिता हो |

मुझ निअपराध अवला  का मेरे पिता ने एक कुष्ठी  मनुष्य के साथ विवाह करा दिया और मुझे घर से निकाल दिया| उनकी निकाली हुई में इस पृथ्वी पर घूमने लगी | हे माता ! इस आपत्ति रूपी समुन्द्र से आपने उधार किया हैं | हे देवी ! मैं  आपको प्रणाम करती हूँ मुझ दीन की रक्षा करो | इस प्रकार सुमति ने मन से देवी को याद किया | और देवी ने सुमति से खा की शीघ्र ही तेरा उद्दालक नाम का पुत्र होगा, जो अति बुद्धिमान , कीर्तिमान , होगा | ऐसा कहकर देवी अंतर्धयान हो गयी |

श्री दुर्गा नवरात्र व्रत विधि

इस व्रत को करने प्रातः उठकर स्नान करके , मंदिर में जाकर या घर पर ही नवरात्रो में दुर्गा जी का धयान करके व्रत रखना चाइये, कथा पढ़नी चाइए | इस व्रत में उपवास या फलहार आदि का कोई विशेष नियम नहीं हैं | कन्याओ के लिए ये व्रत बहुत लाभदायक है | श्री जगदम्बा जी की कृपा से सब विघ्न दूर होते हैं, कथा के अंत में बार-बार “दीर्घा माता तेरी सदा ही जय”  का उच्चारण करे |


श्री दुर्गा नवरात्र पूजा-विधि

आशिवन मास में शुल्कपक्ष की प्रतिपदा से लेकर नौ  दिन विधिपूर्वक व्रत करे | यदि दिन भर का व्रत न कर सके तो एक समय भोजन करे| पढ़े  लिखे ब्राहम्णो से पूछ क्र घट की स्तावना करे और वाटिका बनाकर जल से सींचे | महाकाली ,महालक्ष्मी ,और महा सरस्वती की मूर्तियाँ बनाकर नित्य विधि से पूजन करे और पुष्पों से विधिपूर्वक अर्ध्य दे |

बिजौरा के फूल द्वारा अर्ध्य देने से रूप की प्राप्ति होती हैं, और जायफल से कीर्ति की तथा दाख से कार्य की सीधी होती है | आंवले से सुख और केले से भूषण की प्राप्ति होती हैं | इस प्रकार फलो से अर्ध्य देकर यथा विधि हवन करे | इन दिनों में जो कुछ भी दान दिया जाता हैं, व भगवती दुर्गा उसको उससे चार गुना देती है और उसको मोक्ष की प्राप्ति होती हैं |

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