माँ शैलपुत्री की पूजा की तिथि, मुहूर्त आदि| Date of worship of Mother Shailputri, Muhurta etc in Hindi.

नवरात्रि के नौ दिनों में माँ के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है| आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 17 अक्टूबर से  नवरात्र शुरू होंगे| वहीं दुर्गा पूजा के लिए भी तैयारियां शुरू हो गई हैं|
नवरात्रि इस बार शनिवार माँ शैलपुत्री की अराधना से शुरू होंगे| इन नौ दिनों में व्रती मां की अराधना कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं| दोस्तों हमारा आज का आर्टिकल नवरात्रि के पहले दिन माँ शैलपुत्री की पूजा की तिथि, मुहूर्त व अन्य विषयों पर सम्बन्धित है| तो आइए दोस्तों हमारे आज के इस Article को पढ़ते हैं-

कैसे हुआ माँ शैलपुत्री का जन्म-
माँ शैलपुत्री सुख-समृद्धि की दाता होती हैं, इसलिए इनकी पूजा जीवन में सुख-समृद्धि की प्रप्ति के लिए होती है| ऐसा माना जाता है कि माँ शैलपुत्री की पूजा करने से जीवन में स्थिरता आती है|

पुराणों के अनुसार हिमालय की पुत्री होने के कारण इन्हें प्रकृति स्वरूपा भी कहा जाता है| पूर्वजन्म में ये राजा दक्ष की पुत्री और भगवान शिव की पत्नी थीं| तब इनका नाम सती था|

एक बार राजा दक्ष ने बहुत विशाल यज्ञ का आयोजन किया| उन्होंने सभी राजा-महाराजा व देवी देवताओं को निमंत्रण दिया, लेकिन भगवान शिव का औघड़ रूप होने के कारण उन्हें निमंत्रण नहीं दिया था|

जब देवी सती को अपने पिता के द्वारा विशाल यज्ञ के आयोजन के बारे में पता चला तो उनका मन उस यज्ञ में जाने के लिए व्याकुल होने लगा| तब उन्होंने भगवान शिव को अपनी इच्छा की अनुभूति कराई|

इस पर भगवान शिव ने कहा कि किसी कारण से रुष्ट होकर तुम्हारे पिता ने हमे आमंत्रित नहीं किया है, इसलिए तुम्हारा वहां जाना कदाचित उचित नहीं होगा|

लेकिन देवी सती भगवान शिव की बात पर विचार किये बिना अपने पिता के यहां जाने का उनसे आग्रह करने लगीं| तब भगवान शिव ने उनके बार-बार आग्रह पर वहाँ जाने की अनुमति दे दी|

जब सती वहाँ पहुँची तो उन्होंने देखा कि उनका कोई भी परिजन उनसे प्रेमपूर्वक बात नहीं कर रहा है|अपने परिजनों के इस व्यवहार को देखकर देवी सती को बहुत दुःख हुआ और तब उन्हें इस बात का आभास हुआ कि भगवान शिव की बात न मानकर उनसे बहुत बड़ी गलती हुई है|

वह अपने पति भगवान शिव के इस अपमान को सहन न कर सकीं और उन्होंने तत्काल उसी यज्ञ की योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर दिया|

इसके बाद देवी सती ने पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में पुनर्जन्म लिया और देवी शैलपुत्री के नाम से जानी गयीं|

माँ शैलपुत्री का ध्यान करने के लिए इस मंत्र का जप करें-
ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥

माँ शैलपुत्री की ऐसे करें पूजा-
1. नवरात्रि के पहले दिन पूजा वाले स्थान को अच्छी तरह साफ और पवित्र कर माँ शैलपुत्री की तस्वीर स्थापित करें|

2. उसके नीचे लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं|

3. इसके ऊपर केसर से शं लिखें और उसके ऊपर मनोकामना पूर्ति गुटिका रखें|

4. हाथ में लाल पुष्प लेकर शैलपुत्री देवी का ध्यान करें|

5. कलश स्थापना के बाद मां शैलपुत्री का ध्यावन करें|

6. माँ शैलपुत्री को घी अर्पित करें| मान्यता है कि ऐसा करने से आरोग्य मिलता है|

7. नवरात्रि के पहले दिन शैलपुत्री का ध्यान मंत्र पढ़ने के बाद  स्तोत्र पाठ और कवच पढ़ना चाहिए|

8. शाम के समय माँ शैलपुत्री की आरती कर प्रसाद बांटें|

9. पूजा के समय पीले रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है|

10. फिर अपना व्रत खोलें|

माँ शैलपुत्री की पूजा करने की विधि-
नवरात्रि प्रतिपदा के दिन कलश या घट स्थापना के बाद दुर्गा पूजा का संकल्प लें|

इसके बाद माता दुर्गा के प्रथम रूप शैलपुत्री की​ विधि विधान से पूजा अर्चना करें|

माता को अक्षत्, सिंदूर, धूप, गंध, पुष्प आदि अर्पित करें। इसके बाद माता के मंत्र का उच्चारण करें|

फिर अंत में कपूर या गाय के घी से दीपक जलाकर उनकी आरती उतारें और शंखनाद के साथ घंटी बजाएं|

यदि संभव हो सके तो दुर्गा सप्तशती का पाठ करें या करवाएं| पूजा के दौरान या बाद में क्षमा प्रार्थना करना चाहिए|

माँ शैलपुत्री की पूजा में ध्यान रखने योग्य बातें-

माँ शैलपुत्री स्थिरता का प्रतीक है| यदि जातक का मन अस्थिर हो तो उसे आज के दिन अपने शयन कक्ष को अधिक से अधिक मात्रा में सफेद करें, तथा पूजा स्थल के आस-पास भी अधिक से अधिक सफेदी युक्त वस्तुएं होनी चाहिए|

आज के दिन माँ को अंतिम भोग कच्चे नारियल का होना चाहिए| इससे जातक के मन को स्थिरता प्राप्त होती है और माँ शैलपुत्री उसे अपने मार्ग से विचलित नहीं होने देतीं|

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