वही कर जो ऊपर वाला चाहता हैं| A Motivational Story in Hindi.

किसी ने बड़ी कमाल की बात कही हैं कि भगवान बोलते हैं कि तू वही करता हैं जो तू चाहता हैं, फिर वही होता हैं जो मैं चाहता हूं, इसलिए तू वही कर जो मैं चाहता हूं, फिर वही होगा जो तू चाहता हैं|
दोस्तों हमारा आज का आर्टिकल कृष्ण भगवान और उनके मित्र धनुर्धर अर्जुन और एक पंडित को लेकर हैं|
दोस्तों ये बहुत ही अच्छी कहानी हैं बड़े ही ध्यान से इसको पढियेगा और इससे अवश्य आपको कुछ ना कुछ सीखने को मिलेगा तो आइए पढ़ते हैं-

भगवान कृष्ण और अर्जुन दोनों ही राज्य में घूमने के लिए निकले थे|
दोनों की नजर एक ब्राह्मण देव(पंडित) पर पड़ी| उन्होंने देखा कि पंडित जी भिक्षा मांगने के लिए घर घर जा रहे थे और ये देखकर अर्जुन को अच्छा नहीं लगा कि पंडित जो हैं वो भिक्षा मांग रहे हैं| अलग-अलग गाँव में जा रहे हैं, जाकर दरवाजे पर खड़े होकर भिक्षा मांग रहे तो अर्जुन को दया आ गयी|
ये सब देखने के बाद तुरंत अर्जुन ने बुलाया पंडित जी को और कहा प्रणाम पंडित जी, आपके लिए मेरे पास कुछ हैं और सोने की सिक्के की पोटली पंडित जी को दे दी|
पंडित जी बहुत खुश हुए कि क्या बात हैं भगवान के मित्र ने इतनी बड़ी मदद कर दी है, भगवान की कृपा हैं|
पंडित जी ने भगवान कृष्ण को प्रणाम किया अर्जुन को प्रणाम करके वहां से सीधे अपनी झोपड़ी की ओर चले गए|
पंडित जी रास्ते में बहुत खुश थे, सोच रहे थे मेरी जिंदगी बदल गयी अब मेरे जीवन में बहुत सारी खुशियाँ आ जाएंगी इन सोने के सिक्कों से, लेकिन पंडित जी का दुर्भाग्य तो देखिए जिस रास्ते पर से वो जा रहे थे|
उन्हें वहां लुटेरा मिल गया और उस लुटेरे ने पंडित जी के सोने की पोटली उनसे छीन ली|
पंडित जी दुखी मन से अपनी झोपड़ी में पहुंचे, जाकर अपनी पत्नी को सारी बात बताई कि आज जिंदगी में खुशियाँ आई थी और छू मन्तर हो गयी मतलब आने से पहले ही चली गयी|
पत्नी को यह सब सुनकर बहुत बुरा लगा|

अगले दिन क्या करते पंडित जी का वही काम था भिक्षा मांगने के लिए निकल पड़े|
फिर से भिक्षा मांग रहे थे, फिर भगवान श्रीकृष्ण और उनके दोस्त अर्जुन दोनों घूमने के लिए निकले हुए थे|
उन्होंने फिर से देखा कि पंडित जी तो आज भी भिक्षा मांग रहे हैं|
अर्जुन ने फिर ब्राह्मण देवी को बुलाया और कहा नमस्कार!
क्या हुआ?? मैंने तो आपको सोने के सिक्के की पोटली दी थी, वो पोटली का क्या हुआ?
आप तो फिर से भिक्षा मांगने आ गए|
तो पंडित जी ने सारी बात बताई की कल मेरे साथ बहुत बुरा हुआ……
मेरा तो समय ही खराब चल रहा हैं|
अर्जुन को बहुत दया आयी, अर्जुन ने कहा आप चिंता मत करिए आपके लिए बहुत कीमती चीज हैं मेरे पास एक बेहद कीमती मोती, जिसकी कीमत बहुत हैं और वह मोती भी बेहद अनमोल हैं|
अर्जुन ने वो अनमोल मोती पंडित जी को दे दी और कहा कि लीजिए इसको अपने पास रखिए, आपकी जिंदगी बदल जाएगी|
पंडित जी फिर से खुश हुए भगवान को प्रणाम किया और अर्जुन को धन्यवाद दिया, उनसे कहा धनुर्धर आप सबसे श्रेष्ठ हो अर्जुन की तारीफ करने के बाद पंडित जी वहां से चले गए|
पंडित जी रास्ते मे फिर से सोचने लगे कि वाह! भगवान के मित्र तो कितने दयालु हैं, उन्होंने आज फिर से मुझे दान दे दिया| पंडित जी बेहद ही खुश थे|

जैसे ही पंडित जी अपनी झोपड़ी में आते हैं उनकी पत्नी वहां नहीं होती हैं वह पास में ही नदी के किनारे पानी भरने गयी हुई होती हैं|
पंडित जी घोर के डर से उस मोती को छुपाने के लिए अच्छी जगह तलाशने लगे|
उनके पास कोई संदूक तो था नहीं, तो उन्होंने उस अनमोल कीमती मोती को एक पुराने से मटके में रख दिया| पंडित जी को लगा की यहां ये मोती सुरक्षित रहेगा, यहां चोर की नजर नहीं पड़ेगी|
पंडित जी आराम करने के लिए चले गए, वही उन्हें नींद आ गयी|

इसी बीच में पंडित जी की पत्नी जो नदी के किनारे पानी भरने गयी हुई होती हैं| जिस मटके को लेकर वो गयी होती हैं दुर्भाग्य देखिए वो मटका फुट गया|
अब पत्नी जब वापस झोपड़ी में आयी तो उन्हें याद आया कि एक पुराना मटका रखा हुआ हैं, उस पुराने मटके को लेकर नदी के किनारे गयी|
भाई पानी तो चाहिए, तो मटके को जैसे ही उन्होंने नदी में डुबोया और वैसे ही वो मोती खिसककर नदी में बह गया|
पानी भरकर जब वापस झोपड़ी मे पहुंची तो पंडित जी बैठे हुए थे, माथा ठनका हुआ था बोले- क्या कर दिया?
पुराना मटका लेकर कहाँ चली गयी थी, तो इस पर उनकी पत्नि ने बताया कि नया वाला मटका टूट गया था|
तो इसलिए मैं पुराने मटके में पानी भर लायी|
पंडित ने कहा तुमने सब खत्म कर दिया, सब तबाह कर दिया|
आज मुझे धनुर्धर अर्जुन ने एक मोती दिया था|
वो मोती बेहद ही अनमोल था|
वही मोती मैंने उस पुराने मटके में रखा था, तुम मटके को लेकर गयी और वो पानी के साथ बह गया मोती सब कुछ खत्म हो गया|

पंडित जी अगले दिन फिर से भिक्षा मांगने चले गए, दो-तीन दिन बाद यह चलता रहा|
फिर दो-तीन दिन बाद भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन घूमने के लिए निकले हुए थे|
नजर पड़ी, पंडित जी दिखाई दिए..
अर्जुन ने बोला ये क्या चल रहा हैं, ये फिर से भिक्षा मांगने लगे|
फिर से अर्जुन ने ब्राह्मण देवी को बुलाया और पूछा ये क्या हो रहा हैं?
आपको जो मोती दिया था उसका क्या हुआ?
तो ब्राह्मण देवी ने कहा क्या बताऊँ महाराज?
मेरा तो दुर्भाग्य चल रहा हैं, मेरी पत्नी वो पुराना मटका जिसमें मैंने वो मोती रखा था, मेरी पत्नी उसी मटके को लेकर नदी के किनारे गयी और वो मोती बह गया और अब तो वो मिल भी नहीं रहा हैं|

इस बार अर्जुन ने भगवान की तरफ देखा और श्रीकृष्ण से कहा मदद कीजिए भगवान|

भगवान श्रीकृष्ण ने अपने पास में से दो सिक्के उस पंडित जी को दे दिए और उनसे कहा कि अब आप आगे मत जाएगा, पीछे जाइएगा, जिस रास्ते से आप आए थे उसी पर वापस चले जाइए, अपनी झोपड़ी में जाइए, सब ठीक हो जाएगा|

मना भी नहीं कर सकते थे पंडित जी वो दो सिक्के लिए वापस उसी रास्ते पर चलने लगे और सोचने लगे कि भगवान के दोस्त कितने अच्छे है|
उन्होंने मुझे कितनी बार दान दे दिया और वो भी इतने कीमती कीमती दान और अर्जुन ने मेरी कितनी मदद कर दी|
वहीं दूसरी और सोचने लगे कि भगवान श्रीकृष्ण ने मुझे दो सिक्के, दो पैसे दिए इससे क्या होगा मेरी जिंदगी में|
पंडित जी यही सब सोचते हुए जा रहे थे, तभी नदी के किनारे से एक मछुआरा आ रहा था| अपने साथ में जाल लेकर आ रहा था|
उस जाल में एक बहुत ही सुन्दर सी मछली फंसी हुई थी|
पंडित जी उसे देखा और उन्हें उस मछली पर तरस आ गयी|
उन्होंने सोचा कि इन दो सिक्कों से मेरा तो कुछ नहीं होगा किन्तु इस मछली के प्राण अवश्य बच सकते हैं|
उन्होंने वो दो सिक्के मछुआरें को दिए और उस मछली को लेकर अपने कमंडल में रख दिया|

इसके बाद उन्होंने सोचा कि नदी के किनारे जाता हूँ और इस मछली को जल में प्रभावित कर देता हूं|

पंडित जी जैसे ही कमंडल में से मछली को निकालकर नदी में छोड़ने ही वाले थे|
तभी उनकी नजर कमंडल में पड़ी और उन्हें वो मोती दिखाई दिया जो अर्जुन ने उन्हें दिया था|
वो मोती उस मछली ने खा लिया था और वही मछली घूम फिर कर पंडित जी के पास आ गयी थी|
पंडित जी खुशी के मारे चिल्लाने लगे मिल गया, मिल गया, मिल गया और जब वो ये चिल्ला रहे थे किस्मत से देखिए वो लुटेरा भी वही से गुजर रहा था|
लुटेरे ने देखा कि पंडित जी तो चिल्ला रहे हैं मिल गया, मिल गया, मिल गया, शायद उन्होंने मुझे पहचान लिया हैं|
अब वह मुझे सजा दिल वाकर ही रहेंगे|
लुटेरा दौड़ के पंडित जी के पास और उनके चरणों में गिर गया और उनसे क्षमा मांगने लगा|
उनसे बोलने लगा कि महाराज मुझे माफ कर दीजिए, ये सोने के सिक्के की पोटली आप रखिए अपने पास बस मुझे माफ कर दीजिए और मुझे सजा मत दिलवाना|
पंडित जी चरणों में वो लुटेरा आ चुका, वो सोने की पोटली आ चुकी थी और वो अनमोल मोती भी उनके हाथ मे पहले से ही था|
सब कुछ अच्छा हो गया था|
अर्जुन ने जब ये देखा तो भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि आपको मेरा प्रणाम भगवन और मुझे बताए कि ये आपकी कौनसी लीला हैं|
भगवान आपने क्या कर दिया?
मैंने उस पंडित की मदद की उसको सोने के सिक्के की पोटली दी, उससे भी बेहद कीमती मोती दिया तब कुछ नहीं हुआ|
लेकिन अभी आपने केवल दो सिक्के दिए और सारा खेल पलट गया|
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा अर्जुन से कि मेरे सखा सारा खेल सारी लीला कर्मों का हैं|
सारी लीला सारा खेल सोच की हैं|
तुमने जब उस पंडित को सोने की सिक्के की पोटली दिया तब केवल पंडित अपने बारे में सोचने लगा, अपनी जिंदगी के बारे में सोचने लगा, खुद ही खुद का सोचने लगा|
दूसरी बार तुमने उसको मोती तब भी वह केवल अपने ही बारे में सोचने लगा और आज जब मैंने उसे दो सिक्के दिए तो पंडित ने उस दो सिक्कों से उस मछली की जान बचाने के बारे में सोचने लगा और जहां उसने किसी ओर के बारे में सोचा, अच्छा करने का सोचा वही उसकी जिंदगी में चमत्कार हो गया|

भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन की यह कहानी बहुत बड़ी बात सिखाती हैं|
जिंदगी में अच्छे कर्म अपने आप आपके पास अच्छे फल लेकर आते हैं|
जिंदगी में अगर मौका मिले तो अवश्य किसी की मदद करें|
दोस्तों, सच्चे दिल से की हुई मदद लौटकर दुआ के रूप में अवश्य आपके पास आती हैं और दुआएँ जो होती हैं वो बहुत बड़ा चमत्कार कर देती हैं|
आपने देखा होगा अपने जीवन में की बड़े बड़े हादसे कुछ पल में टल जाते हैं, क्योंकि सामने वाले का कर्म अच्छा होता हैं, जो उसे बचा ले जाता हैं|
दोस्तों, जिंदगी में अपने कर्म को अच्छा बनाइए, मदद करते चलिए, अपने साथ दुआएँ रखिए|
क्योंकि पैसा कमाना आसान हैं, लेकिन दुआएँ कमाना बेहद ही मुश्किल होता हैं|
जिसके पास दुआएँ होती हैं, जिसके पास ऊपर वाले का आशीर्वाद होता हैं, नीचे वाले उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं

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